sooni kalaai poochti kai aakhir humne kiya kiya hai........Kavi Deepak Sharma

by kavyadharateam on November 29, 2008, 11:18:12 AM
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kavyadharateam
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जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ
अर्चना के दीप से ही मन्दिर जलते देखता हूँ ।
देखता हूँ रात्रि से भी ज्यादा काली भोर को
आदमी की मूकता को गोलियों के शोर को
देखता हूँ नम्रता जकडे हिंसा की जंजीर है
आख़िर यकीं कैसे करूँ यह हिंद की तस्वीर है ।
कितने बचपन दोष अपना बेबस नज़र से पूछते है
बेघर अनाथ होने का कारन खंडर से घर पूछते हैं
टूटे कुंवारे कंगन अपना पूछते कसूर क्या है
सूनी कलाई पूछती है आख़िर हमने क्या किया है
सप्तवर्णी चुनरियों के तार रोकर बोलते है
स्वप्न हर अनछुआ मन की बन गया पीर है ॥
नोंक पर तूफ़ान की शमा को लुटते देखता हूँ
रोज़ कितनी रोशनी को खुदकुशी करते देखता हूँ
देखता हूँ कुछ सुमन की ही बगावत चमन से
श्वास का ही विद्रोह लहू , हृदय और तन से ।
लगता है सरिताएं भी हीनता से सूख रहीं
क्योंकि हर हृदय समंदर आँख बनी क्षीर है ॥
हर हृदय की आस होती लौटकर न अतीत लाये
वर्तमान से भी ज्यादा उसका भविष्य मुस्कुराये
लेकिन प्रभु से प्रार्थना कि भविष्य देश का अतीत हो
कुछ नहीं तो हर हृदय में निष्कपट प्रीति हो
क्योंकि नफरत की कैंची है जिस तरह चल रही
डरता हूँ कहीं थान सारा बन न जाए चीर है ॥
Kavi Deepak Sharma
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Prateek Mardia
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«Reply #1 on: November 29, 2008, 11:26:48 AM »
bauht khoob likha he hazoor aapne-desh ke bigadte haalaath ko lekar.
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sajid_ghayel
Guest
«Reply #2 on: November 29, 2008, 12:38:33 PM »
Bohat bohat bohat khoob Deepak jee kitne prabhavshali mudde ko aapne kitni saralta se bayaan kiya hain  Clapping Smiley Clapping Smiley Clapping Smiley Clapping Smiley
Logged
Pooja
Guest
«Reply #3 on: November 30, 2008, 01:56:42 AM »
nice haring Kavi
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NETRAPAL
Guest
«Reply #4 on: December 02, 2008, 04:03:58 AM »
जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ
अर्चना के दीप से ही मन्दिर जलते देखता हूँ ।
देखता हूँ रात्रि से भी ज्यादा काली भोर को
आदमी की मूकता को गोलियों के शोर को
देखता हूँ नम्रता जकडे हिंसा की जंजीर है
आख़िर यकीं कैसे करूँ यह हिंद की तस्वीर है ।
कितने बचपन दोष अपना बेबस नज़र से पूछते है
बेघर अनाथ होने का कारन खंडर से घर पूछते हैं
टूटे कुंवारे कंगन अपना पूछते कसूर क्या है
सूनी कलाई पूछती है आख़िर हमने क्या किया है
सप्तवर्णी चुनरियों के तार रोकर बोलते है
स्वप्न हर अनछुआ मन की बन गया पीर है ॥
नोंक पर तूफ़ान की शमा को लुटते देखता हूँ
रोज़ कितनी रोशनी को खुदकुशी करते देखता हूँ
देखता हूँ कुछ सुमन की ही बगावत चमन से
श्वास का ही विद्रोह लहू , हृदय और तन से ।
लगता है सरिताएं भी हीनता से सूख रहीं
क्योंकि हर हृदय समंदर आँख बनी क्षीर है ॥
हर हृदय की आस होती लौटकर न अतीत लाये
वर्तमान से भी ज्यादा उसका भविष्य मुस्कुराये
लेकिन प्रभु से प्रार्थना कि भविष्य देश का अतीत हो
कुछ नहीं तो हर हृदय में निष्कपट प्रीति हो
क्योंकि नफरत की कैंची है जिस तरह चल रही
डरता हूँ कहीं थान सारा बन न जाए चीर है ॥
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bahut khoob deepak ji bahut achee kavitaa aapne likhi hai aaj ke haalaat pe..

netra..
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Azeem Azaad
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Humko Abtak Aashiqi Ka Wo Zamaana Yaad Hai,.

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«Reply #5 on: December 07, 2008, 01:24:38 PM »
Bahoot Khoob Kavya Ji,.
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